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श्री समर्थ सिंह कंग / सुन्दरानन्ददास जी के द्वारा प्रस्तुत जिज्ञासा BRVF – Followers – 1 समूह WhatsApp पर —

आचार्य श्री, बड़े बड़े मुनि सत्व को प्राप्त करके भी श्रीहरि कृपा को कदाचित ही प्राप्त करें। तो सांसारिक रजोगुण से प्रभावित कुब्जा पर कृपा क्यों? काम क्रोध आदि ही तो रजोगुण का प्रधान लक्षण है  – कथं तस्य मुकुन्दस्य स्फूर्ति: ? 🙏🏻 और यदि कहें कि श्रीकृष्ण की कामना पूर्ति ही प्रेम है, तो श्रीकृष्ण को ‘अकाम’ कहा जाता है – उनमें कामना कैसी? 🙏🏻 यदि कृष्ण रास नृत्य करते हैं, तो नृत्य की कामना गोपियों की है वा श्रीकृष्ण की?🙏🏻

भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर आचार्यश्री गुरुपाद के द्वारा प्रदत्त समाधान —

१) क्योंकि कुब्जा रामावतार की शूर्पणखा की अवतार है कृष्णलीला में जो कि शूर्पणखा के रूप में राघवेन्द्र पर लट्टू हो चुकी थी लौकिक काम से प्रेरिता होकर।

२) पद्मपुराणोक्त जो ‘शोकामर्षादिभिर्भावै: आक्रान्तम् यस्य मानसम् । कथं तस्य मुकुन्दस्य स्फूर्तिसम्भावना भवेत् ।।’ — श्लोक है, उसके अनुसार जिस मुकुन्दस्फूर्ति की असम्भावना जताई गयी है रजस्तमोगुणोत्पादित शोक, अमर्ष आदि लौकिक भावों/विकारों के चलते, वह असम्भाविता मुकुन्दस्फूर्ति भक्ति के लक्षणान्तर्गता मुकुन्दस्फूर्ति है जो कि स्मर्त्ता (स्मरण करने वाला) के भगवान् के प्रति आनुकूल्यविशिष्ट होने पर ही जागृता होती है।

पर जो मुकुन्दस्मरण स्मर्त्ता के प्रातिकूल्यविशिष्ट होने पर जागृत होता है, यथा कंस जैसे असुरादियो के द्वारा कृत भगवच्चिन्तन — वह तो रजस्तमोगुणोत्पादित ही है। केवल भगवत्सम्बन्ध के कारण वैसा चिंतन भी मोक्षप्रदायक हो जाता है । ऐसा नहीं मानने पर श्रीमद्भागवत के ७.१.३१ के साथ विरोध उपस्थित होगा।

३) श्रीकृष्ण लौकिक भोग व संसृति से मोक्ष आदि कामनाओ से शून्य है। पर उनमे रसिकशेखरत्त्व ‘रसो वै सः’ (तैत्तिरीय श्रुति) से सिद्ध होने के कारण व रस के आस्वाद्यरस व आस्वादकरस — ये दो एक सिक्के के दो पहलूँ होने के कारण (‘रस्यते आस्वाद्यते इति रसः’ व ‘रसयति आस्वादयति इति रसः’ — दो प्रकार की व्युत्पत्ति रस शब्द की स्वीकारी गयी है) — उनमें रसपिपासावाञ्छा भक्तिरसशास्त्रवेत्ताओ के द्वारा स्वीकारी गयी। अर्थात् श्रीनन्दनन्दन में रसिकशेखरत्त्व उनके रसमयत्त्व का ही एक पहलूँ है। अतः रसास्वादन की कामना उन रसब्रह्म में रहना उनके ब्रह्मत्त्व को ही और अधिक पुष्ट करता है। अतः केवल भोगमोक्षादि कामनाओ से विरहित होने के कारण वे भगवान् ‘अकाम’ वा ‘निष्काम’ कहें जाते है, रसपिपासाराहित्य के कारण नहीं! रसपिपासाराहित्य उनमें अपास्त (असम्भावित) है।

४) नृत्य की कामना केवल श्रीमती वृषभानुजा के कारण है। मैथिलभूप्रसूत महाकवि जयदेव जी का गीतगोविन्दमहाकाव्योद्धृत प्रमाणवचन — ‘कंसारिरपि संसारवासनाबद्धश्रृंखलाम् । राधामाधाय हृदि तत्त्याज व्रजसुन्दरी: ।।’ । संसारवासना का अर्थ यहाँ रसास्वादनवासना लेना है।

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