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गौडीय सिद्धान्त के अनुसार साधना के प्रारम्भ से ही कृष्णसेवाव्यतिरिक्त अन्य समस्त भोग एवं मोक्ष की वासनाओं को जो कलुषित ह्रदय में हो, उनकी पूर्त्ति करने के बजाय जैसे दंतहीन सर्प होता है वैसे उनकी उपेक्षा करते हुए उनको पड़े रहने दिया जाता है (श्रील रूप गोस्वामिपाद के उपदेशामृतम् के प्रथम दो श्लोक द्रष्टव्य है) बिना उनके वश में आये व बिना उनकी पूर्त्ति के प्रयास को किये । कालान्तर में, अनर्थनिवृत्ति की दशा के उदित होने पर, दन्तहीन सर्प के सामान जो भोग-मोक्षादि इतर वासनाएँ ह्रदय में उपेक्षित होकर विद्यमती है, उनका पूर्णरूपेण नाश होता है । यह सर्पवध के तुल्यहै ।

यदि अपसिद्धान्त के द्वारा ऐसा मान लिया जाए कि इच्छाओ के रहते रहते और उन भोगमोक्षादि की इच्छाओं को पूरा करते करते और साथ ही साथ सकामभक्ति करते करते कालान्तर में निष्कामता प्राप्त होती है, तो हम यह बता देवें कि ऐसा केवल भक्तिमहारानी की असाधारणा व आपवादिकी कृपा से ही कुछ गिने चुने महापुरुषो के लिए ही सम्भव है । ध्रुव को परम निष्काम भक्त नारद जी के सङ्ग का लाभ होने पर भी वे अर्थार्थी भक्त या सकाम भक्त ही बने रहे बहुत लम्बे समय तक । और तो और इन्द्रादि भी अनेक वार भगवत्साक्षात्कार आदि होने पर भी सकाम ही बने रहते है । निष्कर्ष यह निकलता है कि ध्रुव जैसे कुछ आपवादिकी श्रेणी में आने वाले भक्तों के ऊपर ही केवल भक्तिमहारानी की स्वतन्त्रा इच्छा (जिसमे न भगवान, न शुद्धभक्त और न ही सकाम भक्त का कोई हस्तक्षेप चलता है । यदि भगवान् का हस्तक्षेप चलता तो इन्द्रादि भगवद्भक्त देवता भी उनके अनेक वार प्राप्त हुए साक्षात्कार के उपरान्त निष्काम हो गए होते । यदि शुद्धभक्त का हस्तक्षेप चलता तो नारद के सङ्गमात्र से ध्रुव को निष्काम हो जाना चाहिए था । जब भगवान व शुद्धभक्त भक्तिदेवी की स्वतन्त्रा इच्छा को प्रभावित नहीं कर सकते, तो भला सकामभक्त वैसा कैसे कर सकता है । माधुर्यकादम्बिनी के प्रथमाध्याय के प्रारम्भ में श्रीविश्वनाथ चक्रवर्त्तिपाद के अनुसार भी केवल भक्तिमहारानी की स्वतन्त्रा इच्छा/कृपा से ही उत्तमा (शुद्ध) भक्ति के प्रथम सोपान अर्थात् साधनभक्ति में प्रवेश प्राप्त होता है । पारमार्थिकी या निर्गुणा श्रद्धा के उदय के पश्चात् ही साधन भक्ति शुरू होती है । सकाम भक्ति साधन भक्ति कभी भी नहीं मानी गयी ।) होने पर ही वें ध्रुवादि विशिष्ट भक्त सकाम से निष्काम बन पाते हैं । हर प्रकार के सकाम भक्त कभी भी निष्काम नहीं बन पाते । मामला आपवादिक है, सामान्य नही ।

जैसे कि चैतन्यदेव ने सनातनशिक्षा में दिग्दर्शित किया चैतन्यचरितामृत में, वैसे साधारण नियम यही है कि यदि शुद्धाभक्ति का साधक सकाम इच्छाओ को ह्रदय में पाले रखता है तो श्रवणकीर्तनादिजल का सिंचन कभी भी हृदयस्थित शुद्धभक्ति के बीज को वर्द्धित नहीं कर सकता । उलटा जैसे धान के पौधों के साथ उगी जंगली श्यामाघास ही समस्त खाद-जल इत्यादि को स्वयं ग्रहण करते हुए उसे धान के पौधों तक नहीं पहुचने देती, ठीक वैसे ही श्रवणकीर्तनादिरूपा नवधाभक्ति का जल व खाद भोगमोक्षादियो की प्राप्ति में ही पूरे अपव्यय को प्राप्त हो जाएगा और ह्रदय में पड़ा शुद्धभक्ति का बीज सूख जाएगा । इसीलिये श्रीमद्भागवत के श्लोक – “राजन्पतिर्गुरुरलं……अस्त्वेवमंग भगवान्भजताम्मुकुन्दो मुक्तिम्ददाति कर्हिचित्स्म न भक्तियोगम्” (भक्तिरसामृतसिन्धु के पूर्वविभाग के प्रथमाध्याय में भी उद्धृत) में भी कहा गया है कि श्रीभगवान् भोगमोक्षादि प्रलोभनों को देकर साधक को टालते रहते है और प्रेम प्रदान नहीं करते । यही साधारण नियम है । अपवाद को साधारण बनाना ही अपसिद्धान्त है ।

— भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर आचार्य श्री वा गुरुपाद

सूचना — अपसिद्धान्त का दृष्टान्त ऊपर दिये गये चित्र में देखा जा सकता है एक ISKCON के मागधी (बिहारी) यादव कुलप्रसूत महात्मा के द्वारा दिया गया ।

4 thoughts on “राधागोविन्दस्वामीमतखण्डनम् / Refutation of the views of Rādhāgovinda Svāmī.

  1. कुछ और विवेचना श्रीभगवान् की उपासना में भोगमोक्षादि कामनाओं के विषय में / Some further analysis on the matter of extraneous desires in devotion to God.

    १) अध्यात्म के मार्ग पर ‘simple’ मति रखने से काम नही चलेगा, क्योकि यहाँ प्रखर प्रज्ञा की आवश्यकता है जो कि शास्त्रानुगता हो । यह मार्ग भी छुरे के धार पर चलने के समान है एवं उपनिषदों में इसी की पुष्टि करते हुए कहा गया है कि – “क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत् कवयो वदन्ति” ।

    २) श्रीहरि की किसी भी प्रकार की भक्ति न करने से तो बेहतर है उनकी सकामभाव से उपासना करना और ऐसी श्रीहरि की सकामभाव से की गयी उपासना सर्व प्रकार की अन्यदेवतोपासना से श्रेष्ठा है हर सन्दर्भ में । यही श्रीमद्भगवद्गीतोक्त सिद्धान्त के द्वारा प्रतिपादित है ।

    ३) श्रीहरि की सकामभाव से की गयी उपासना से निष्कामता केवल कुछ आपवादिक सन्दर्भों में ही प्राप्त होती है, अन्यथा साधारण उपासको के लिये जब तक वे श्रीहरि के विशुद्ध निष्काम भक्तो के सङ्ग में निष्कामभाव से भक्ति करने के लिये लालायित नही होङ्गे, तब तक ऐसा सम्भव नही है कि वे आकस्मिक रूप से निष्काम बन जाये ।

    ४) प्रभु कृपा से सकाम से निष्काम नही बना जा सकता है एवं इस बात की पुष्टि के लिये हमने हमारे विश्लेषण में कुछ उदाहरण भी दिये हैं । निष्काम उपसना के प्रति लालसा भक्तिदेवी की इच्छा होनेपर शुद्ध भक्तो के सङ्ग के माध्यम से ही होती है ।

    – भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर आचार्य श्री गुरुपाद

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    The point that in the beginning of the sādhanā and esp. before the anartha-nivṛtti stage, the desires of bhoga and mokṣa will remain is accepted even by us in our confutation of the said ISKCONite Rādhāgovinda Svāmī Jī. This is not the point of contention.

    The point of contention is that when the said Svāmī asserts that there is no need of a separate endeavour to curb those extraneous desires of bhoga and mokṣa. Only by bhakti, those desires will be removed. This is the point of dispute. Why? Let us see how.

    As explained in our confutation above and as explained by Śrī Viśvanātha Cakravarttī in his Mādhurya-kādambinī, if the desires of bhoga and mokṣa are not curbed (we are not saying that they should be removed before anartha-nivṛtti – as its practically impossible to remove them before the stage of anartha-nivṛtti and if they are eradicated before the stage of anartha-nivṛtti, the very concept of anartha-nivṛtti shall turn futile), then the external execution of the limbs of bhakti like śravanām, kīrttanam etc. done alongside the ‘uncurbed’ desires of bhoga and mokṣa will result in ‘bhakty-uttha-anartha’ or the unwanted obstructions or anarthas arising from the very execution of such bhakti in which the desires of bhoga and mokṣa are not tamed.

    This same has been indicated by Śrī Caitanyadeva in his śikṣā to Śrī Rūpa Gosvāmī by giving the example of how the sādhaka (compared with a gardener) should consciously endeavour to remove the weeds of the unwanted desires of bhoga and mokṣa which grow alongside the main paddy plant of devotion. Kindly refer to the passage of Caitanya-caritāmṛta, Madhya-līlā, Ch. 19, Verses 152-162 and esp. the verse 161.

    The doctrine of the said Svāmī that those desires of bhoga and mokṣa should just not be disturbed and that they will be automatically removed by bhakti without sādhaka’s own separate endeavour – is faulty and in clear contravention with the conventional Gauḍīya Vaiṣṇava siddhānta. If svātma-kṛpā or sādhaka’s own desire to curb and gradually remove those desires will not be there, then those desires will not be removed, but will rather be prospered and fulfilled by the execution of bhakti.

    Reference — https://goo.gl/27s1xf

    – Bhaktirasavedāntapīṭhādhīśvara Ācārya Śrī Gurupāda

    Liked by 1 person

    1. Dear Swami Ji ,

      Hare Krishna,

      I can see what you are trying to say but before making wrong coclusion you should review the point made by Radha Govinda Swami. and understand from our sastra. This is not his personal opinion but it is based on vedic scriptures.

      This is given in Srimad Bhagavatm very clearly. Here is the reference.
      akāmaḥ sarva-kāmo vā
      mokṣa-kāma udāra-dhīḥ
      tīvreṇa bhakti-yogena
      yajeta puruṣaṁ param

      A person who has broader intelligence, whether he be full of all material desire, without any material desire, or desiring liberation, must by all means worship the supreme whole, the Personality of Godhead.

      HDG Srila Prabhupada clearly mentioned at the end of purport,
      “As the unmixed sun ray is very forceful and is therefore called tīvra, similarly unmixed bhakti-yoga of hearing, chanting, etc., may be performed by one and all regardless of inner motive.”

      It is stated in Caitanya-caritāmṛta (CC Madhya 22.31):
      kṛṣṇa—sūrya-sama, māyā haya andhakāra
      yāhāṅ kṛṣṇa, tāhāṅ nāhi māyāra adhikāra
      “Godhead is light. Nescience is darkness. Where there is Godhead there is no nescience.” This material world is full of darkness and ignorance of spiritual life, but by bhakti-yoga this ignorance is dissipated.

      Also in SB 3.25.33

      jarayaty āśu yā kośaṁ
       nigīrṇam analo yathā
      “Bhakti, devotional service, dissolves the subtle body of the living entity without separate effort, just as fire in the stomach digests all that we eat.”

      In the purport it is mentioned –
      The impersonalists undergo severe penances and austerities to attain mukti, but the bhakta, simply by engaging himself in the bhakti process, especially in chanting Hare Kṛṣṇa, Hare Kṛṣṇa, Kṛṣṇa Kṛṣṇa, Hare Hare/ Hare Rāma, Hare Rāma, Rāma Rāma, Hare Hare, immediately develops control over the tongue by engaging it in chanting and by accepting the remnants of foodstuff offered to the Personality of Godhead. As soon as the tongue is controlled, naturally all other senses are controlled automatically. Sense control is the perfection of the yoga principle, and one’s liberation begins immediately as soon as he engages himself in the service of the Lord.

      There are many more references like this in our sastra. I can provide if you need more.

      Hope this will help you in better understanding.

      Thank you very much for your time.
      Hare Krishna.

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