Bhagavatapurana manuscript - 2nd

शैव पक्ष —

केवल श्रीमद्भागवत ही नहीं, अपितु शिव पुराण भी कैतव रहित है तथा वेदान्तमय ही है –

“विकैतवो धर्म इह प्रगीतो वेदांतविज्ञानमयः प्रधानः ||”
(- शिवपुराण १/२/६६)

 

भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर के द्वारा उपरोक्त पक्ष का निरसन —

१) यदि शिवपुराण १.२.६६ के वचन को यथार्थ में लिया जाये तो उसका विरोध होता है वेदव्यास के द्वारा अन्तिम आविर्भावित श्रीमद्भागवत के १.४.३१ (“किं वा भागवता धर्मा न प्रायेण निरूपिताः । प्रियाः परमहंसानां त एव ह्यच्युतप्रियाः ।।“) के साथ । “उत्तरोत्तरं प्रामाण्यं” (परवर्ती पूर्ववर्ती की अपेक्षा अधिक सबल प्रमाण माना जाता है) इस प्रथा के अनुसार भी श्रीमद्भागवत वेदव्यास के द्वार अन्तिम प्रकटित ग्रन्थ होने के कारण उसके कीसी भी कथन का प्रामाण्य सर्वोपरि है!

२) यदि वेदव्यास के द्वारा वास्तव में ही परमतम भागवतधर्मो का निरूपण पहले (शिवपुराणादियो में) हो गया होता तो नारदमुनि की भा. पु. १.४.३१ वाली उक्ति ही निरर्थिका हो जायेगी! अतएव शिवपुराण का कैतवराहित्य ‘आपेक्षिक’ है, ‘आत्यन्तिक’ नही । जबकी श्रीमद्भागवत का ‘कैतवराहित्य’ (जो कि भा. पु. १.१.२ के द्वारा स्पष्टीकृत है – “धर्मः प्रोज्झित कैतवोऽत्र परमो”) आत्यन्तिक है क्योकि श्रीमद्भागवत ९.४.६७ (“मत्सेवया प्रतीतं ते सालोक्यादिचतुष्टयम् । नेच्छन्ति सेवया पूर्णाः कुतोऽन्यत्कालविप्लुतम् ।।“)  एवं भा. पु. ३.२९.१३ (“सालोक्यसार्ष्टि…दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः”) – ये ऐसे स्पष्ट ऐसे प्रमाण है जो कि ‘मोक्षरूपी’ कैतव को भी विदूरित करने वाले है एवं श्रीधरस्वामी तथा अन्य समस्त वैष्णवसंप्रदायो के श्रीमद्भागवत के संस्कृत टीकाकारो के द्वारा भा. पु. १.१.२ के “धर्मः प्रोज्झित कैतवोऽत्र परमो” – की व्याख्या करते समय मोक्षाभिसन्धि एवं उसके प्रतिपादन को ही प्रधानकैतव माना है (“प्रशब्देन तु मोक्षाभिसन्धिरपि निरस्तः” – भावार्थदीपिकायां) । शिवपुराण में इस प्रकार के मोक्षाभिसन्धिरहित कैतव का राहित्य नही अपितु अवस्थिति है (क्योकि शिवपुराण में कोई भी ऐसा प्रमाण/श्लोक नही जो कि मोक्ष-तिरस्कार-प्रतिपादक हो), अतएव शिवपुराण का कैतवराहित्य बहुत ही आपेक्षिक है एवं शिवपुराण के संदर्भ में कैतवरहित होने का अर्थ है उसमे शिवोपासना के अनन्यत्व का प्रतिपादन जो कि शिवोपासको के लिये ‘अकैतव’ माना जा सकता है ।

 

शैव पक्ष —

“यदि शिवपुराण १.२.६६ के वचन को यथार्थ में लिया जाये तो उसका विरोध होता है वेदव्यास के द्वारा अन्तिम आविर्भावित श्रीमद्भागवत के १.४.३१ (“किं वा भागवता धर्मा न प्रायेण निरूपिताः । प्रियाः परमहंसानां त एव ह्यच्युतप्रियाः ।।”) के साथ ।
>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>> यदि ऐसा माना जाय कि भागवत के अलावा कहीं भी भागवत धर्म निरूपित नहीं हुआ, तब तो अन्य पुराणों से विरोध उपस्थित होगा क्योंकि भागवत धर्म तो उनमें भी वर्णित है ही , ज्ञान भक्ति और वैराग्य तीनों का सम्यक् सन्निवेश भागवतेतर पुराणों में भी है , जैसा कि – “यत्र गीतं त्रिकं प्रीत्या भक्तिज्ञानविरागकम् ॥” (-शिवपुराण १/३/४) अतः अन्य पुराणों की अपेक्षा इसमें ही प्रधानतया स्फुटित हुआ है , ऐसा ही मानना युक्तियुक्त है न कि केवल इसी में ही भागवत धर्म वर्णित हुआ हो ऐसी बात है | वेदान्तवेद्य भगवत्तत्व का विशेष रूप से प्रतिपादन तो भागवतेतर पुराण भी करते ही हैं , जैसा कि – “वेदांतवेद्यं सद्वस्तु विशेषेण प्रवर्णितम् ॥” (- शिवपुराण१/३/५) किन्तु जैसे गीता पाठ करने के उपरांत भी माहात्म्य पाठ से उसका विशेष आनंद प्राप्त होता है , ऐसे ही भागवत के विषय में भी समझना चाहिए |

 

भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर के द्वारा उपरोक्त पक्ष का निरसन —

जिस भक्ति, ज्ञान एवं वैराग्य का संनिवेश शिवपुराण में उक्त है वह भागवतधर्म की कोटि का है नही है | कैसे? प्रमाण –

क) यदि जिस भक्ति, ज्ञान एवं वैराग्य की बात शिवपुराण १.३.४ करता है वह भागवतधर्म की कोटि के होते तब तो श्रीमद्भागवत से पूर्व प्रकाशित शिवपुराण के सम्यक् पाठमात्र से ही नारदमुनि कृष्ण-शक्ति-स्वरूपा [“परमानन्दचिन्मूर्त्तिः सुन्दरीं कृष्णवल्लभाम्” — पद्मपुराण, उत्तरखण्ड, भागवतमाहात्म्य, द्वितीय अध्याय, श्लोक सङ्ख्या ५]  एवं मुक्तिरूपिणी दासी की भी अधीश्वरीरूपा [“मुक्तिं दासीं ददौ तुभ्यं ज्ञानवैराग्यकाविमौ” – पद्मपुराण, उत्तरखण्ड, भागवतमाहात्म्य, द्वितीय अध्याय, श्लोक सङ्ख्या ७] भक्तिदेवी एवं उसके दो तनय ज्ञान तथा वैराग्य का विषादग्रस्त एवं मूर्छावस्था से उद्धार करा लिये होते | पर पद्मपुराणोक्त प्रमाण के आधार पर तो विपरीत ही देखनो को मिलता है यथा – (पद्मपुराण, उत्तरखण्ड, भागवतमाहात्म्य, द्वितीय अध्याय, श्लोक सङ्ख्या ३९-४१) – “हाहाकारो महानासीत्त्रैलोक्ये विस्मयावह: । वेदवेदान्तघोषैश्च गीतापाठैर्विबोधितम् ।। भक्तिज्ञानविरागाणाम् नोदतिष्ठत्त्रिकं यदा । उपायो नापरोऽस्तीति कर्णे कर्णेऽजपञ्जना: । योगिना नारदेनापि स्वयं न ज्ञायते तु यत् ।“ तथा (पद्मपुराण, उत्तरखण्ड, भागवतमाहात्म्य, द्वितीय अध्याय, श्लोक सङ्ख्या २७) – “वेदवेदान्तघोषैश्च गीतापाठैर्मुहुर्मुहुः । बोध्यमानौ तदा तेन कथञ्चिच्चोत्थितौ बलात् ।।“ एवं (पद्मपुराण, उत्तरखण्ड, भागवतमाहात्म्य, द्वितीय अध्याय, श्लोक सङ्ख्या ६४-६५) – “वेदवेदान्तघोषैश्च गीतापाठै: प्रबोधितम् । भक्तिज्ञानविरागाणाम् नोदतिष्ठत्त्रिकं यदा ।। श्रीमद्भागवतालापात्तत्कथं बोधमेष्यति ।“ तथा (पद्मपुराण, उत्तरखण्ड, भागवतमाहात्म्य, द्वितीय अध्याय, श्लोक सङ्ख्या ७२-७३) – “वेदान्तवेदसुस्नाते गीताया अपि कर्त्तरि । परितापवति व्यासे मुह्यत्यज्ञानसागरे । तदा त्वया पुरा प्रोक्तं चतुःश्लोकसमन्वितम् । तदीयश्रवणात्सद्यो निर्बाधो बादरायणः ।।“ तथा (पद्मपुराण, उत्तरखण्ड, भागवतमाहात्म्य, तृतीय अध्याय, श्लोक सङ्ख्या १५+२०) – “वेदान्तानि च वेदाश्च मन्त्रास्तन्त्राः समूर्त्तयः । दशसप्तपुराणानि षट्शास्त्राणि तथाऽययुः। वेदोपनिषदोऽन्यत्र…” और सर्वान्त में (पद्मपुराण, उत्तरखण्ड, भागवतमाहात्म्य, तृतीय अध्याय, श्लोक सङ्ख्या ७०) – “भवद्भिरद्यैव कृतास्मि पुष्टा कलिप्रणष्टापि कथरसेन…” – इन सभी साक्ष्यो के आधार से यह निर्विवाद सिद्ध होता है कि जिस समय व्यास समस्त वेद, वेदान्त, अन्य पुराण (शिवपुराण समेत) एवं गीतादि का प्रकाशन करने के उपरान्त विषादग्रस्त हो गये थे, तब भागवतशास्त्र ने उन्हे उबारा था एवं यह भी सिद्ध होता है कि वेद, वेदान्त, गीत, अन्य समस्त पुराणादियो (शिवपुराण समेत) का पाठ करने पर भी भक्ति, ज्ञान एवं वैराग्य का दुःख दूर नही हुआ, तब केवल भागवत ने ही काम दिया! पद्मपुराण का उपरोद्धृत श्लोक तो स्पष्ट कहता है कि अन्य समस्त १७ पुराण (शिवपुराण समेत) भी आसीन थे उस सत्र में कि जहा पर भागवतकथा के माध्यम से ज्ञान, भक्ति एवं वैराग्य के दुःख को दूर किया गया – यह एक बडा ही अकाट्य जो की यह सिद्ध करता है कि यदि शिवपुराण में इतना दमखम होता तो शिवपुराण को श्रोताओ की पङ्क्ति में न बैठकर भागवतकथा सुननी पडती वरन् शिवपुराण की ही कथा से ज्ञान, भक्ति एवं वैराग्य का संकट अपनोदित हो जाता । पर ऐसा न होना ही श्रीमद्भागवत के असाधारण वैशिष्ट्य को सिद्ध करता है एवं श्रुतार्थापत्तिप्रमाण से यह भी सिद्ध करता है कि जिस ज्ञान, भक्ति एवं वैराग्य के प्रतिपादक होने की बात शिवपुराण १.३.४ करता है वे स्वरूपतः श्रीमद्भागवतशास्त्रवर्णित ज्ञान, वैराग्य एवं भक्ति से पृथक् कोटि के है (यदि वे पृथक् कोटि के न होते तब तो शिवपुराण के पाठ से की काम बन जाता ज्ञान, वैराग्य एवं भक्ति के संकटमोचन का) ।

ख) तो अब यह प्रश्न उठता है कि शिवपुराण जिन ज्ञान, भक्ति एवं वैराग्य का प्रतिपादक है वे किस कोटि के है? उत्तर यह है कि मत्स्यपुराण एवं ब्रह्मवैवर्त्तपुराण शिवपुराण को तामसिक पुराण की कोटि में संनिविष्ट करते है अतः इस हेतु से तामसिक शास्त्र (जो कि मूलतया सात्विक पृष्ठभूमि पर आधारित है) के द्वारा प्रतिपादित ज्ञान, वैराग्य एवं भक्ति भी तामसिक श्रेणी के ही सिद्ध होते है – प्रतिपादक एवं प्रतिपाद्य के समशीलत्व (समस्वभावत्व) की युक्ति पर । इसको दूसरे तरीके से भी सिद्ध किया जा सकता है कि श्रीमद्भागवत स्पष्टतया शिव को मायिक त्रिगुणो से संवृत्त मानता है एवं विष्णु को पूर्णतया निर्गुण वा त्रिगुणातीत स्वीकार करता है – प्रमाण यथा – (भा. पु. १०.८८.५) – “हरिर्हि निर्गुणः साक्षात्पुरुषः प्रकृतेः पर: । स सर्वदृग उपद्रष्टा तं भजन्निर्गुणो भवेत् ।।“ तथा (भा. पु. १०.८८.३) – “शिवः शक्तियुतो शश्वत्त्रिलिङ्गो गुणसंवृतः । वैकारिकस्तैजसश्च तामसश्चेत्यहं त्रिधा ।।“ – इन साक्ष्यो के आधार पर यह स्पष्ट है कि शिवपुराण के द्वारा प्रतिपाद्य शिव ही जब मायिकत्रिगुणसंवृत है तब तो वैसे शिव का प्रतिपादक शिवपुराण भी मायिकत्रिगुणसंवृत है एवं उस शिवपुराण के द्वारा प्रतिपाद्य ज्ञान, भक्ति एवं वैराग्य भी त्रिगुणसंवृत श्रेणी के है – निर्गुणस्वरूप (त्रिगुणातीत) हरि के प्रतिपादक निर्गुणस्वरूप श्रीमद्भागवत के द्वारा प्रतिपाद्य निर्गुण कोटि के ज्ञान, वैराग्य एवं भक्ति की श्रेणी के वे नही है ।

ग) जिस कोटि का वेदान्तमयत्व एवं कैतवविगीतत्व (कैतवराहित्य) शिवपुराण का है वह भी भागवत के कैतवराहित्य से पृथक् कोटि का है यह अकाट्य युक्तियो के आधार पर पूर्व की हमारी टीपप्णीयो में स्पष्टीकृत है ।

 

शैव पक्ष —

“उत्तरोत्तरं प्रामाण्यं” (परवर्ती पूर्ववर्ती की अपेक्षा अधिक सबल प्रमाण माना जाता है) इस प्रथा के अनुसार भी श्रीमद्भागवत वेदव्यास के द्वार अन्तिम प्रकटित ग्रन्थ होने के कारण उसके कीसी भी कथन का प्रामाण्य सर्वोपरि है! यदि वेदव्यास के द्वारा वास्तव में ही परमतम भागवतधर्मो का निरूपण पहले (शिवपुराणादियो में) हो गया होता तो नारदमुनि की भा. पु. १.४.३१ वाली उक्ति ही निरर्थिका हो जायेगी! अतएव शिवपुराण का कैतवराहित्य ‘आपेक्षिक’ है, ‘आत्यन्तिक’ नही । जबकी श्रीमद्भागवत का ‘कैतवराहित्य’ (जो कि भा. पु. १.१.२ के द्वारा स्पष्टीकृत है – “धर्मः प्रोज्झित कैतवोऽत्र परमो”) आत्यन्तिक है क्योकि श्रीमद्भागवत ९.४.६७ (“मत्सेवया प्रतीतं ते सालोक्यादिचतुष्टयम् । नेच्छन्ति सेवया पूर्णाः कुतोऽन्यत्कालविप्लुतम् ।।“) एवं भा. पु. ३.२९.१३ (“सालोक्यसार्ष्टि…दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः”) – ये ऐसे स्पष्ट ऐसे प्रमाण है जो कि ‘मोक्षरूपी’ कैतव को भी विदूरित करने वाले है एवं श्रीधरस्वामी तथा अन्य समस्त वैष्णवसंप्रदायो के श्रीमद्भागवत के संस्कृत टीकाकारो के द्वारा भा. पु. १.१.२ के “धर्मः प्रोज्झित कैतवोऽत्र परमो” – की व्याख्या करते समय मोक्षाभिसन्धि एवं उसके प्रतिपादन को ही प्रधानकैतव माना है (“प्रशब्देन तु मोक्षाभिसन्धिरपि निरस्तः” – भावार्थदीपिकायां) । शिवपुराण में इस प्रकार के मोक्षाभिसन्धिरहित कैतव का राहित्य नही अपितु अवस्थिति है (क्योकि शिवपुराण में कोई भी ऐसा प्रमाण/श्लोक नही जो कि मोक्ष-तिरस्कार-प्रतिपादक हो), अतएव शिवपुराण का कैतवराहित्य बहुत ही आपेक्षिक है एवं शिवपुराण के संदर्भ में कैतवरहित होने का अर्थ है उसमे शिवोपासना के अनन्यत्व का प्रतिपादन जो कि शिवोपासको के लिये ‘अकैतव’ माना जा सकता है ।”>>>>>>>>>>>>>
>>>>>>>>>>>>>>>> >>>>>>>>> >>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>> एक ही पुराण का अष्टादश रूपों में विभाग होने से पूर्वापर का भेद करना केवल और केवल बौद्धिक वैकल्यता है और कुछ नहीं | जैसा कि कहा गयाहै कि सृष्टि के आदि मे पुराण अपने मूल एकत्व स्वरूप मे श्री ब्रह्मा जी के अन्तःकरण मे प्रकाशित हुआ – पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम् | (-मत्स्यपु० ५३/३) | भगवान श्री हरि का कौनसा अंग पहले निर्मित होता है और कौन सा बाद में ?? ऐसे ही पुराण भी नित्य और अद्वैयस्वरूप होने के कारण उसमें पूर्वापरता नहीं बनसकती | व्यासजी कोई भागवत के रचयिता नहीं हैं जो कि उत्तरोत्तर प्रमाण की बात आवे, वो मात्र संकलनकर्ता हैं | भागवत धर्मों का निरूपण पौराणिक वांग्मय में किस प्रकार से कैसे है , यह हम पूर्व वक्तव्य में ही स्पष्ट कर आये हैं अतः इस पर जो अनर्थ कल्पना निर्माण आगे सविस्तार किया गया है उसका खंडन स्पष्ट हो चुका है |

 

भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर के द्वार उपरोक्त पक्ष का निरसन —

एक ही पुराण अष्टादशरूपो में प्रकाशित है यह बात तो हम भी जानते है पर साङ्गोपाङ्गरूपेण श्रीमद्भागवत का प्रकाशन तो सर्वान्त में ही हुआ वेदव्यास के द्वारा अन्तिम आविर्भावित ग्रन्थ के रूप में एवं आनन्दरामायणम् भी इसी बात की संपुष्टि करता है | श्रीजीवगोस्वामिपाद अनेकानेक अकाट्य प्रमाणो एवं युक्तियो के आधार पर यह सिद्ध करते है तत्त्वसन्दर्भ में की श्रीमद्भागवत पहले समाधिस्थित कृष्णद्वैपायनव्यास जी के चित्त में सूक्ष्मरूप से आविर्भूत हुआ जो गायत्रीभाष्यपरिमित था, फिर उन्होने उसके विस्तृत अर्थ को सङ्क्षिप्त करके सूत्ररूप में प्रकाशित किया अर्थात् उपक्रमात्मक ग्रन्थ की अपेक्षा कुछ परिवर्द्धितरूप प्रकटित हुआ | उसके भी पीछे दृष्टान्त, युक्ति अवतारणा, इतिहास-भाग गायत्री का तात्पर्य एवं उपसंहार आदि के साथ सुविस्तृत अर्थो वाला परिदृश्यमान  १८००० श्लोको वाला विस्तारितरूप से साक्षाद् श्रीमद्भागवत जगत् में प्रचारित हुआ | इसी कारण से अन्य पुराणो में भी भागवत का उल्लेख है एवं महाभारत में भी १८ पुराणो का उल्लेख है जबकि भागवतानुसार (प्रथम स्कन्ध के चौथे से सातवे अध्यायो तक) भागवत वेदव्यास का सर्वान्तिम आविर्भावित ग्रन्थ है – ये सभी बाते युगपत् रूप से बिना कल्पभेद का तर्क उपस्थित किये एक साथ सत्य है क्योकि पहले भागवत सूत्ररूप से, मध्य में किञ्चित् परिवर्द्धितरूप से एवं सर्व्वान्त में १८००० श्लोको से युक्त रूप में प्रकाशित हुआ है! शुक एवं परीक्षित् का संवाद भी नित्य है क्योकि उसका उल्लेख पद्मपुराण में गौतम-अम्बरीष के संवाद में हुआ है जो कि सत्ययुग में घटित हुआ था (“अम्बरीष! शुकप्रोक्तं नित्यं भागवतं शृणु | पठस्व स्वमुखेनापि यदीछसि भवक्षयम् ||”) | अतएव इन सभी बातो का समाधान यह है कि शुक-परीक्षित् का संवाद अनादिकालीन एवं नित्य है तथा केवल द्वापरान्त में व्यावहारिक रूप से घटित होता है (जैसे की नाटकलेख तो पूर्व से ही अस्तित्व में होता है पर उसका अभिनय बहुत पश्चात् किया जाता है) | स्कान्दपुराणोक्त आख्यान के आधार पर निष्कर्ष यह भी निकलता है कि सत्ययुग में श्रीमद्भागवत सामान्यरूपेण अन्य पूराणो के साथ विद्यमान था (भगवद्निःश्वसितरूप उसका प्रकाशन हुआ था सृष्टि के प्रारम्भ में) , परन्तु द्वापरान्त आते आते वह लुप्त हो गया एवं (जैसे गीता ज्ञान भी लुप्त हुय एवं श्रीकृष्ण को उसे पुनः अर्जुन के समक्ष प्रकाशित करना पडा) जब ब्रह्मरुद्रादि देवो से विष्णु प्रार्थित हुये (स्कान्दी कथा) तब जाकर कृष्णद्वैपायन वेदव्यास के रूप में अवतरित होकर उपरोक्त तीन क्रमो से भागवत को प्रकाशित किया गया है | साररूप से श्रीमद्भागवत को वेदव्यास के द्वारा अन्तिम आविर्भावित ग्रन्थ कहना ही प्रासङ्गिक एवं शास्त्रोक्त है | प्रमाण – (तत्त्वसन्दर्भे) – “पूर्व्वं सूक्ष्मत्वेन मनस्याविर्भूतम् तदेव सङ्क्षिप्य सूत्रत्वेन पुनः प्रकटितम् पश्चाद्विस्तीर्णत्वेन साक्षात्श्रीभागवतमिति” |

 

शैव पक्ष —

मत्स्य पुराण के अनुसार (54.69) —

“अष्टादश पुराणानि कृत्वा सत्यवतीसुतः ।
भारताख्यानमखिलं चक्रे तदुपबृंहितम् ।।”

18 पुराणों के बाद महाभारत की रचना व्यास जी ने की । 18 पुराणों में भागवत को 5 वें स्थान पर पुराणों में गिना जाता है । अतः भागवत अंत में ही प्रकट होता है ऐसा कोई शास्वत नियम नहीं । भागवत की कथा को ध्यान में रखकर यह स्पष्ट कहा जा सकता है की कल्पभेद से ग्रन्थ प्राकट्य में क्रम भेद होता रहता है ।

 

भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर के द्वारा उपरोक्त पक्ष का निरसन —

तत्त्वसन्दर्भानुसारी व्याख्या (जो कि श्रीमद्भागवत के द्वापरान्त में प्राकट्य के सम्बन्ध में श्रीमद्भागवत तथा अन्य पुराणो में बताये हुये भागवतविषयक उल्लेखो की पूर्ण समाधानस्वरूपा व्याख्या है) जो की इससे पूर्व की टीपप्णी में उपर उद्धृता है – इस बात का समाधान कर देती है (श्रुतार्थपत्ति के द्वारा) कि जो भागवत महाभारत से पूर्व प्रकाशित था वह सङ्क्षिप्त रूप था । रही बात भागवत को ५वे स्थान पर गिने जाने की तो सभी पुराणो के अन्त में वेदव्यास १८ पुराणो की सूची देते है एवं सभी सूचीयो में क्रम पृथक् पृथक् बताया गया है अतः यह सिद्ध होता है कि पुराणो में बताया हुआ सूची क्रम उनके वेदव्यास के द्वारा आविर्भाव होने के क्रम को नही दर्शाता । वह केवल औपचारिक उल्लेख मात्र है ।

 

सार — शैव प्रतिवादिगण निरुत्तर ।

 

Note — The English rendition of the same shall come in a matter of some time.

Leave a Reply

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s