अतिरिक्त स्पष्टीकरण —

“रागानुगा भक्ति पूर्णतया शास्त्रनिरूपिता/शास्त्राधारितपरिभाषिता व आंशिकरूपेण शास्त्रापेक्षा है। शास्त्रापेक्षत्व त्रिविध है — १) शास्त्रादेशप्रवर्तितत्व, २) शास्त्रविध्यनुगामित्व व ३) शास्त्रवर्णितभगवल्लीलाश्रुतत्व।

यदि शास्त्रादेशप्रवर्तितत्व के सन्दर्भ में शास्त्रापेक्षत्व का व्यवहार होता है, तब तो रागानुगा भक्ति वैसे शास्त्रापेक्षत्व से कतही सम्बन्धिता नहीं — ‘…नात्र शास्त्रम् च युक्तिम् च तल्लोभोत्पत्तिलक्षणम्..’ (भ.र.सि.) के आधार पर। यही उसका वैधी से मूलभूत भेद है।

पर यदि शास्त्रविध्यनुगामित्व के सन्दर्भ में शास्त्रापेक्षिता की बात उठायी जाती है, तब तो रागमार्ग के नाम पर उछ्रींखलता का अनुसरण करने वाले तथाकथिता व्रजसोपासना का आडम्बर करनेवाले जिन सम्प्रदायो में एकादशीव्रत का बहिष्कार हुआ है शास्त्रविध्यननुगामित्व के कारण — उन समस्त पन्थो को गौडीयो ने पाखण्डी माना है ‘…इति सौरम्यमतम् निरस्तम्…’ (विश्वनाथ चक्रवर्त्ति की भ.र.सि. के ऊपर टीका द्रष्टव्या)। अतः शास्त्रविध्यनुगामित्व के सन्दर्भ में रागानुगा भक्ति की शास्त्रापेक्षिता गौडीयो के द्वारा स्वीकृता है।

यदि शास्त्रवर्णितभगवल्लीलाश्रुतत्त्व के सन्दर्भ में शास्त्रापेक्षा की बात उठायी जाती है, तब भी वैसा शास्त्रापेक्षित्व रागानुगा भक्ति के ऊपर लागू है — ‘…श्रीमूर्तेर्माधुरीम् वीक्ष्य तत्तल्लीलाम् निशम्य वा…’ (भ.र.सि.), ‘तत्तद्भावादिमाधुर्ये श्रुते धीर्यदपेक्षते..’ (भ.र.सि.) — आदिओ की टीकाओं में श्रीमद्भागवतवर्णिता लीलाओं के श्रवण के द्वारा राग का साधक के हृदय में प्राकट्य स्वीकृत हुआ होने के कारण। श्रीमद्भागवत एक शास्त्र है या नहीं, वह तो विज्ञजन को पता होना चाहिए।”

— भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर आचार्य श्री गुरुपाद

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