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वेदान्तपथ पर गमन के कुछ महत्त्वपूर्ण पहेलुँ —

 

क) सत्य शास्त्रीय सिद्धान्तों की केवल एक समानान्तर दीर्घ रेखा का निर्माण करना ही पर्याप्त नहीं, क्योंकि उससे केवल ‘अन्वय’ की पूर्ति होती है । ‘व्यक्तिरेक’ अर्थात् मिथ्या ज्ञान का खण्डन भी युगपद्रूपेण अनिवार्य है । अन्वय व व्यतिरेक – ये दोनो ही विधियाँ एक साथ विधेया हैं वास्तविक पारमार्थिक उद्देश्य के पूर्ति हेतु । प्रमाण – श्रीमद्भागवतमहापुराण २.९.३६ ।

 

ख) सत्य ज्ञान के प्रतिपादन भी दो विधियों से होता है – १) समास (सङ्क्षिप्त) व २) व्यास (विस्तारित) । ‘समास’ रीति के द्वारा प्रतिपादित ज्ञान का समीचीन अवबोधन केवल गिने चुने अधिकारी ही कर सकते हैं, जबकि ‘व्यास’ पद्धति के द्वारा उपदिष्टा विद्या का सम्यक ग्रहण जनसाधारण के द्वारा हो सकता है । प्रमाण – श्रीमहाभारत १.१.२७ ।

 

ग) ‘तपस्या’ व ‘ब्रह्मचर्य’ के द्वारा ही अध्यात्म की वास्तविकी अनुभूति सम्भव है । प्रमाण – श्रीमहाभारत १.१.५४, श्रीमद्भागवत २.९.६, श्रीवाल्मीकीय रामायणम् १.१.१ व श्रीब्रह्मसंहिता ५.२५ ।

 

घ) श्रीमहाभारत व श्रीवालमीकीय रामायणम् का आविर्भाव ज्ञान व अष्टाङ्गयोगात्मिका समाधि से हुआ है, जबकी श्रीमद्भागवत का आविर्भाव भक्तियोगरूपीणी समाधि से । प्रमाण – श्रीमहाभारत १.१.२८ के पश्चात् अतिरिक्त दाक्षिणात्य पाठ, श्रीवाल्मीकीय रामायणम् १.१.१  व श्रीमद्भागवत १.७.४ ।

 

ङ) महापुरुषों की प्रज्ञा भी शास्त्रानुगा ही होनी चाहिये, अन्यथा वे विमोहित ही माने जायेंगे । तब फिर साधारण लोक के पक्ष में तो शास्त्रानुगा बुद्धि होना अति अनिवार्य है । जिसकी शास्त्रानुगा बुद्धि नही, वही लोक व परमार्थ के विषय में सम्मोहित माना जाता है । प्रमाण – श्रीमद्भगवद्गीता १६.२३-२४ व श्रीमहाभारत १.१.२४४ ।

 

च) इतिहास (महाभारत व वाल्मीकीय रामायण) व पुराणों (पञ्चरात्रादि सहित) की सहायता के बगैर मूल चतुर्वेदों का कदर्थघटन अवश्यम्भावी है । प्रमाण – श्रीमहाभारत १.१.२६७ व १.२.३८२ ।

 

ज) मननविहीन शास्त्रानुशीलन व्यर्थ है । प्रमाण – श्रीमहाभारत १.१.७८-७९ ।

 

झ) ‘अज्ञानतिमिरान्धस्य..’ श्लोक का मूल स्रोत श्रीमहाभारत १.१.८४ ।

 

ञ) ‘श्रीविष्णु/हरि’ ही परब्रह्म । प्रमाण – श्रीमहाभारत १.१.२२-२५ ।

 

ट) जो ज्ञान महाभारत (उपलक्षण के द्वारा सनातनधर्म के शास्त्रो में) में है, वही अन्यत्र कहीं सही तो कहीं विकृत रूप से है । और जो यहाँ नहीं, वो कहीं नहीं । प्रमाण – श्रीमहाभारत १.२.३८८ ।

 

ठ) श्रीमद्भागवतमहापुराण ब्रह्मसूत्र का अकृत्रिम व्याख्यान है (क्योंकि ब्रह्मसूत्र व श्रीमद्भागवत — दोनों के आविर्भावक एक ही वेदव्यास है), श्रीमद्भगवद्गीता (महाभारत) का तात्पर्यनिर्णायक है, ब्रह्मगायत्री/त्रिपदा सावित्री मन्त्र (वेदो की जननी) का भाष्य है तथा वेदार्थो का परिबृम्हणकारी है । अतः वेदान्तसूत्र सहित समूची प्रस्थानत्रयी का अर्थघटन श्रीमद्भागवत के आधार पर ही करणीय है । व्याख्यान (भाष्य) व्याख्येय (जिसके अर्थ को स्पष्ट किया जा रहा है वह) को समझाता/स्पष्टीकृत करता है, न कि व्याख्येय व्याख्यान को!

समूचे भारतीय वैदिक वाङ्ग्मय में यदि किसी एक शास्त्र को समस्त प्रस्थानत्रयी (उपनिषद्/श्रुतिगण, श्रीमद्भगवद्गीता व ब्रह्मसूत्र) का व्याख्यान व उस प्रस्थानत्रयी से भी अधिक उत्कृष्ट निर्देशित किया गया हो, तो केवल श्रीमद्भागवत के सम्बन्ध में ही वैसे वचन अन्यान्य पुराणों में दृष्टिगोचर होते हैं । यहाँ तक कि शिवपुराण में जो शिवपुराण को अकैतव घोषित किया गया है, वह भी आपेक्षिक सीमित शिवोपासना के सन्दर्भ में है, नहीं तो श्रीमद्भावत का निष्कैतवत्त्व ही आत्यन्तिक तथा व्यापक सन्दर्भ में है — उसके मोक्षतिरस्कारित्त्व तथा पञ्चमपुरुषार्थस्वरूप भगवत्प्रेम की सर्वश्रेष्ठता के प्रतिपादक होने के कारण (वैसा मोक्ष का तिरस्कार शिवपुराण में कहीं नही है) ।

प्रमाणनिचय — गरुडपुराण का श्लोक ‘अर्थोऽयं ब्रह्मसूत्राणां भारतार्थविनिर्णयः । गायत्रीभाष्यरूपोऽसौ वेदार्थपरिबृंहितः ।।’ व पद्मपुराण, उत्तरखण्ड, १८९.१८-१९, १९०.३९-४०, १९०.६४-६६, १९०.६७-७४, १९१.६७-७० १/२ तथा १९१.६१ १/२ ।

 

 

 

  • भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर आचार्य श्री गुरुपाद

(आणन्द, गुजरात, भारत)

 

 

 

 

Important aspects for treading on the Vedāntic path —

 

a) Simply drawing a parallel longer line of correct philosophy is not enough, as it produces only the ‘anyava’ aspect. ‘Vyatireka’ or the ‘refutation’ of the false ideology is needed concurrently, as well. Anvaya and Vyatireka – both the processes must go on hand in hand for reaching the actual conclusion. Evidence – Śrīmadbhāgavatamahāpurāṇa 2.9.36.

b) There are two processes of propounding spiritual knowledge viz., the shortened and the lengthened. Only a few selected eligible candidates can assimilate the knowledge propounded through synopsis; whereas, the knowledge depicted through the elaborate way can be comprehended by all general populace. Evidence – Śrīmahābhārata 1.1.27.

c) Spirituality can be factually realized only through austerity and celibacy. Śrīmahābhārata 1.1.54, Śrīmadbhāgavata 2.9.6, Śrīvāmīkīya Rāmāyaṇam 1.1.1 & Brahmasamhitā 5.25.

d) Mahābhārata and Rāmāyaṇam were revealed via the trance/inspiration characterized by jñānayoga and aṣṭāṅ Whereas, Śrīmadbhāgavata was revealed by the trance qualified by bhaktiyoga. Evidence – The additional Southern reading after Mahābhārata 1.1.28, Śrīmadvāmīkīya Rāmāyaṇam 1.1.1 and Śrīmadbhāgavatam 1.7.4.

e) The intellect of great saintly personalities should be abiding with the scriptures, or else, even they will be perceived as bewildered. If so, such an alignment with the scriptures is wholly mandatory in the context of common folks. One whose intellect fails to align with the scriptures is deemed as a bewildered one both in spirituality and in mundane sphere. Evidence – Śrīmadbhagavadgītā 16.23-24 and Śrīmahābhārata 1.1.244.

f) Bereft of the knowledge of itihāsas (Vāmīkīya Rāmāyaṇam and Mahābhārata) and purāṇas (including the pañcarātrika texts), misinterpretation of the first four Vedic texts is a must. Evidence – Mahābhārata 1.1.267 & 1.2.382.

g) Studies of scriptures without a succeeding contemplation culminates in futility. Evidence – Śrīmahābhārata 1.1.78-79.

h) The original source of the ‘ajñāna-timirāndhasya…’ verse is Mahābhārata 1.1.84.

i) Śrī Viṣṇu/Hari is, certainly, the Almighty Absolute Truth. Evidence – Śrīmahābhārata 1.1.22-25.

j) That knowledge which is contained in Mahābhārata (through upalakṣaṇa-nyāya, all scriptures of Sanātana-dharma are taken into account) – is residing somewhere in a true form and elsewhere, in a perverted form. That which is not here, is nowhere. Evidence – Mahābhārata 1.2.388.

k) Śrīmadbhāgavatamahāpurāṇa is, the natural commentary on Brahmasūtra (because the compiler of Brahmasūtra and ŚBMP are one — Vedavyāsa), the ascertaining authority of the import of Śrīmad-bhagavadgītā (Mahābhārata), the purport of the Brahma-gāyatrī/Sāvitrī-mantram (the mother of Vedas) and a scripture fulfilling the import of the Vedas. Hence, the interpretation of whole prasthāna-trayī including the Vedānta-sūtra shall be done according to the tenets of Śrīmad-bhāgavatam. Commentary explains the commented subject and not vice versa.

Within whole Indigenous Vedic literary corpus, if any one scripture/text has been declared as the commentation on the prasthāna-trayī (Upaniṣads, Śrīmad-bhagavad-gītā and Brahmasūtra) and even much more significant than prasthāna-trayī, it is none other than Śrīmad-bhāgavatam. For this reason, such assertions are found in other Purāṇas only for ŚBMP. Even when it is declared by Śivapurāṇa that it (Śivapurāṇa) is devoid of all contamination (‘akaitava’), such declaration made about it is only in limited relative context of Śiva worship. Whereas, the contamination-free status of ŚBMP is in ultimate context due to its (ŚBMP’s) rejection of the fourth puruṣārtha i.e. mokṣa/mukti/liberation and establishment of the bhagavat-prema as the fifth ultimate objective (such rejection of mokṣā is never to be seen in Śivapurāṇa).

Evidence — Garūḍapurāṇa verse – artho ‘yaṁ brahmasūtrāṇāṁ..‘ and the Padma-purāṇa, Uttara-khaṇḍa 189.18-19, 190.39-40, 190.64-66, 190.67-74, 191.67-70 1/2 & 191.61 1/2.

 

 

  • Bhaktirasavedāntapīṭhādhīśvara Ācārya Śrī Gurupāda

(Anand, Gujarat, India)

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