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वेदान्तशास्त्रज्ञान की अत्यनिवार्यता के ऊपर पुनः विवेचन — (English rendition, alternatively, available)

१) यदि पारमार्थिक सत्य का अवबोधन प्राप्त करना इतना भी सुगम होता तो जटिल दर्शनशास्त्रों के वैविध्य से व अनेकानेक पन्थों/सम्प्रदायों के मतमतान्तरों से सनातनधर्मीय साहित्यिक भण्डार कालक्रम से इस अभिवृद्धि को प्राप्त न हुआ होता !

२) शबरी आदि भक्त पूर्वजन्मों की साधना के फलस्वरूप इस अंतिम जन्म में सिद्धि को प्राप्त करते हैं । उनका शास्त्रज्ञान पूर्वजन्मसिद्ध होता है । बिना शास्त्रज्ञान के तो भक्ति क्या, कोई भी मार्ग सिद्धि का प्रदाता नहीं । श्रीमद्भगवद्गीता १६.२३-२४ को पढ़ लेना । सब स्पष्ट हो जाएगा।

३) भक्तप्रवर प्रह्लाद नृसिंहदेव के नित्यसिद्ध परिकर है। नित्यसिद्ध भगवतपार्षदगण का ज्ञान सदैव स्वाभाविक रहता है श्रीहरि की संविदाख्या वृत्ति के नित्य अधिष्ठानस्वरूप होने के कारण । उन्हें कृत्रिम रूप से शास्त्रों का अध्ययन करके ज्ञान अर्जित करने की आवश्यकता नहीं । तथापि, लोकसंग्रहार्थ वें शास्त्राध्ययन करके शास्त्रोपदिष्टा भक्ति का प्रकाशन करते है। यह तथ्य स्पष्ट होता है श्रीमद्भागवत के सप्तमस्कन्धान्तर्गत प्रसिद्ध श्लोकद्वय — ‘श्रवणं कीर्तनं…..तन्मन्येधीतमुत्तमम्’ — इसमें प्रयुक्त हुए ‘अधीतम्’ पद के द्वारा । शास्त्राध्ययन के फलस्वरूप श्रीप्रहलाद भक्ति को सर्वश्रेष्ठा विद्या/ज्ञान/अध्ययन घोषित कर रहें हैं ।

द्वितीय ठोस प्रमाण प्राप्त होता है श्री.भा.म.पु. १.२.१२ में जहाँ पर ‘…भक्त्या श्रुतगृहीतया’ — इस पद के द्वारा श्रौत वा शास्त्रोपदिष्टा भक्ति को प्रमाणित किया गया है । अतः भक्ति (शक्ति) व श्री हरि (शक्तिमान्) — उभय के स्वरूपविषयक ज्ञान के वेदादि शास्त्र ही जनक है ‘योनि’ पद के द्वारा ।

४) यदि भक्ति श्री हरि की स्वरूपशक्ति की ह्लादिनी नाम्नी वृत्ति की अंशविशेषा है, तो शास्त्र भी श्रीहरि के ही तो स्वरूप है श्री.भा.म.पु. ७.११.७ के ‘सर्ववेदमयो हरिः’ — इस प्रमाण के आधार पर । अधिकन्तु, ब्रह्मसूत्र के ‘शास्त्रयोनित्वात्’ — के आधार पर तो ब्रह्मस्वरूप के प्रतिपादन में वेदादि शास्त्र ही योनि या मूल के रूप में स्थापित हुए हैं !

५) महाकवि सूरदास जी को परमज्ञानी बृहस्पतिशिष्य श्री उद्धव का पुनरावतार माना जाता है पुष्टिमार्ग में । अतः उनके अज्ञानी होनेकी तो बात ही काल्पनिक है ।

६) मीराबाई पूर्वजन्मार्जित शास्त्रज्ञानप्रसूत संस्कारों से लैस थीं, अन्यथा उनके पदों में यत्र तत्र सर्वत्र शास्त्रीय सिद्धान्त कूट कूट के भरे न पड़े होते । लेकिन तथापि गौडीयवैष्णवाचार्यशिरोमणि श्रील जीव गोस्वामिपाद (जो कि व्रज की अप्रकट नित्य लीला की विलास मञ्जरी सखी हैं) के महत्संग के प्रभाव से ही मीराँबाई ने श्रीचैतन्यदेव के नन्दनन्दनत्त्व को माना और उनका पद — ‘अब तो हरिनाम लौ लागि….चैतन्य जाको नाम..गौरकृष्ण की दासी मीरा रसना कृष्ण बसै।’ — इसकी पुष्टि करता है ।

७) रही बात वाल्मीकि की, तो पुराणों के साक्ष्य के आधार पर वें अपने अन्तिम जन्म में (कि जिसमें उन्होंने वाल्मीकीय रामायणम् को प्रकट किया) ब्रह्मा जी के मानस पुत्र प्राचेतस के रूप में प्रकट हुए । कठोर तपस्या के अनन्तर उनका नाम वाल्मीकि हुआ । अतः ब्रह्मकुलजात मुनि होने के कारण वे शास्त्रज्ञानयुक्त थे ।

८) ध्रुव श्रीहरि के शङ्ख के स्पर्श से समस्त शास्त्रज्ञान से ओतप्रोत हो गए एवं भगवत्साक्षात्कार के अनन्तर ही वें शुद्धभक्त के रूप में परिवर्त्तित हुए भगवत्साक्षात्कार के पूर्व वें अर्थार्थी सकाम भक्त की श्रेणी में थे — श्रीमद्भागवत के तथा श्रील रूप गोस्वामिपाद के भक्तिरसामृतसिन्धु के आधार पर यह सब प्रमाणित होता है ।

९) रही बात व्रजांगनाओं की, तो उनमें से जो नित्यसिद्धा न होकर साधनसिद्धा व कृपासिद्धा थीं, वे अधिकतर श्रुतिचरी व मुनीचरी गोपियाँ थीं जो कि साक्षात् मुनि व उपनिषद् होने के कारण शास्त्रज्ञानमय थे ।

१०) केवल शुद्धनाम का आश्रय लें तो अन्य किसी भी साधन की आवश्यकता नहीं — यह बात शास्त्रों में कही गयी है। यह शुद्धनाम तो एक बार उच्चारित होने पर भी सर्वार्थसाधक है । पर ऐसा शुद्धनाम (नामाभास, शुद्धनाम, व नामापराध — इन तीनों में अन्तर है) केवल प्रेमाभक्ति की दशा के आपन्न होने पर ही तो उदित होता है ! एवं प्रेमाभक्ति बिना साधनभक्ति के पूर्वानुशीलन के उदित हो ही नहीं सकती (कृपासिद्धों की आपवादिकी अतिसूदूर्लभा ऐतिहासिकी कुछ एक आख्यायिकाओं के अतिरिक्त — क्योंकि कृपासिद्ध तो तत्क्षण प्रेमाभक्ति लाभ जो करते हैं न!)! तथा साधनभक्ति वा अभिधेयतत्त्व में प्रविष्ट होने के लिए अनुबन्धचतुष्टयात्मकज्ञान एक अनिवार्य कड़ी है जिसके ऊपर किसी भी प्रामाणिक प्राचीन विविध वैष्णव सम्प्रदायाचार्यो ने कोई विकल्प प्रस्तुत नहीं किया है ।

११) पराभक्ति का उदय शास्त्रज्ञानसम्पुष्ट अनुबन्धचतुष्टय (अधिकारी, सम्बन्ध, अभिधेय व प्रयोजन) की पृष्ठभूमिजाता शास्त्रीया पारमार्थिकी निर्गुणा रत्यङ्कुररूपा श्रद्धा से ही सम्भव है । अतः उपनिषदोक्त ‘यस्य देवे परा भक्तिः….’ में ‘…तस्यैते कथिता: ह्यर्था: प्रकाशन्ते..’ का तात्पर्य विज्ञानम् से लेना है, न कि ज्ञानम् से । क्योंकि भगवती श्रुति अन्यत्र उद्घोषणा करती है — ‘विज्ञाय प्रज्ञाम् कुर्वीत’ अर्थात् ‘विज्ञान के निमित्त प्रज्ञान या ज्ञान का अनुशीलन करो’ । ध्यातव्य है कि यहाँ भक्तिशास्रज्ञान ही अभिप्रेत है एवं प्रासंगिक भी । न कि निर्भेदब्रह्मानुसन्धानकारक पथ ज्ञानमार्ग। श्रीमद्भागवत के ‘वासुदेव भगवति…. जनयत्याशु वैराग्यम् ज्ञानं च यदहैतुकम्’ में जिन ज्ञान व वैराग्य के उदय की बात की गयी है साधनभक्ति के अनुशीलन के अनन्तर, वह कदापि साधनभक्ति का पूर्वाङ्गद्वारस्वरूप भक्तिशास्त्रों का अनुबन्धचतुष्टयात्मक ज्ञान व साधनभक्ति का अङ्गभूत युक्तवैराग्य नहीं हो सकता उस साधनभक्ति के वह फलस्वरूप होने के कारण । अतः साधनभक्ति से उत्पादित ज्ञान अन्तः व बहिः भगवत्साक्षात्कारात्मक ज्ञान है जिसको कि वास्तव में विज्ञान कहा जाता है पारिभाषिक सन्दर्भ में । वह विज्ञान साधनभक्ति के फलस्वरूप भाव व प्रेमकी दशा में उपस्थित होता है। तथैव साधनभक्ति से उत्पादित वैराग्य साधारण व साधनभक्तिद्वारस्वरूप युक्तवैराग्य से पृथक् सिद्धकोटि का वैराग्य है ।

१२) उपनिषदोक्त ‘…न मेधया न बहुना श्रुतेन’ का तात्पर्य यदि यह लिया जाता है कि बहुत श्रवण से भी वह परब्रह्मानुभूति सम्भवपरा नहीं, तब तो ऐसे कदर्थ का स्पष्ट विरोध नवधाभक्तिरूपिणी साधनभक्ति के श्रवणरूपी प्रथमांग से हो जाएगा । अतः ऐसा अर्थ न लेकर यह अर्थ लेना है कि केवल श्रवणरूपी भक्त्यंग से सीधे भगवत्प्राप्ति संभव नहीं। अपितु, श्रवणरूपी साधनभक्ति के अनुशीलन के द्वारा जो भगवत्कृपा उत्पादिता होतीं है — उस अनुग्रहवारीवर्षण से सीधी भगवत्प्राप्ति संभव है ।

१३) श्रीचैतन्यदेव जो अशिक्षित विप्र के साथ सम्भाषण किये दक्षिणापथ की यात्रा के अवसर पर, वें विप्र प्रेमाभक्ति के स्तर पर पूर्वारूढ़ हो चुके थे जो कि उनके विषय में निरूपित चैतन्यचरितामृतोक्त लक्षणावली से स्पष्ट है । पर इस प्रेमाभक्ति के स्तर पर आरोहण से पूर्व अपने पूर्वजन्म में साधनभक्ति की अवस्था में विना गुरुसान्निध्य अथवा महत्संग में शास्त्रोक्त भागवतधर्म की शिक्षा प्राप्त किये तो उनकी साधनभक्ति या भजनक्रिया का ही तो शुभारम्भ नहीं हो सकता था ! प्रमाण — ‘तद्विद्धि प्रणिपातेन…’ (गीतोक्त), ‘सतां प्रसंगान्ममवीर्यसंविदो…’ (भागवतोक्त), ‘गुरुपादाश्रयस्तस्मात् कृष्णदीक्षादिशिक्षणम्…’ (भक्तिरसामृतसिन्धूक्त) व ‘तत्र भागवतान्धर्मान्शिक्षेद्गुर्वात्मदैवतः….’ (भा.पु. ११.३.२२)।

१४) किंवदंतीयाँ कदापि शास्त्रप्रमाणों का पर्य्याय नहीं बन सकती । और यदि यें किंवदंतीयाँ शास्त्रसिद्धान्त के विपरीत जा रहीं हों, तब तो वें सर्वथा उपेक्षणीया हैं। हम गौडीय अन्यनिरपेक्षशब्दप्रमाण की महत्ता को स्वीकारते हैं श्रीजीवपाद के तत्त्वसन्दर्भ: व सर्वसंवादिनी के आधार पर।

१५) श्रील रूप गोस्वामिपाद के कृष्णनामाष्टकम् के कतिपय वचन यथा — ‘निखिलश्रुतिमौलिरत्नमाला…’ व भागवतोक्त ‘….यज्जिह्वाग्रे वर्त्तते नाम तुभ्यम्…’ आदि वचनों का लक्ष्यार्थ ‘शुद्धनाम’ से है जो कि केवल उन्नता जातरति (भावभक्ति) व प्रेमाभक्ति की अवस्था प्राप्त होने पर ही साधक की जिह्वा पर स्वतः उदित होतें हैं । परन्तु वैसी जातरति साधनभक्ति की परवर्तीनी अवस्था है व साधनभक्ति का प्रारम्भ ही सम्भव नहीं बिना शास्त्रोक्त अनुबंधचतुष्टय का ज्ञान प्राप्त किये — गौडीय सिद्धान्त में ! प्रमाण — ‘श्रुतिस्मृतिपुराणादिपञ्चरात्रविधिम् विना । एकान्तिकी हरेर्भक्तिः उत्पातायैव कल्पते ।।’ — ब्रह्मायामलतंत्र का वचन भक्तिरसामृतसिन्धूद्धृत ।

१६) जब कर्मविद्याप्रतिपादक त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) विवेचक शास्त्रों के लौकिक प्राकृत ज्ञान का फल लौकिक ‘विनय’ वा दैन्य माना गया लौकिक हितोपदेशादि व कौटिल्य के नीतिशास्त्रादियों में (विद्या ददाति विनयं), तब अलौकिकी ब्रह्मविद्या/अध्यात्मविद्या/राजविद्या/गुह्यविद्या अर्थात् भक्तिशास्रों के ज्ञान का फल भला अविनय या अहंकार कैसे माना जा सकता है — भक्ति के पराविद्या होने के कारण भा.पु. के ‘यत्कर्म हरितोषं यत् सा विद्या तन्मतिर्यया’ के आधार पर ?

१७) गौडीयब्रुवों की मक्कारता के कारण व उनके संख्याधिक्य से मूल गौडीय वातावरण के अधुना दूषित होने के कारण ही वर्त्तमान गौडीय परम्परा में गुरुकुलपद्धतिगत शास्त्राध्ययन व शास्त्राध्यापन की परिपाटी लुप्तप्रायः हो चुकी है ।

— — भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वरा: गुरुपादाचार्या: रामकृष्णस्वामिन: आम्नायवाचस्पतय: अचिन्त्यभेदाभेदवेदान्तवादिन: गौडीयवैष्णवसाम्प्रदायिन: /- Bhaktirasavedāntapīṭhādhīśvara Gurupādācārya Rāmakṛṣṇa Svāmī Āmnāya-vācaspati Acintya-bheda-abheda-vedāntī Gauḍīya-vaiṣṇava-sampradāyī

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