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महत्त्वपूर्ण सन्देश —

 

“शास्त्रों के प्रकृत अर्थों का अवबोधन करना भगवद्भजन का सर्वोत्तम रूप है । वह समय का अपव्यय नहीं है । प्रमाण – श्रीमद्भगवद्गीता १८.६७-७१।

पूर्वपक्ष —

‘ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वणः । अधीतास्तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षरद्वयम्  ।।’

अनुवाद –

जिसने ‘हरि’ इन दो अक्षरो का उच्चारण कर लिया, उसने समस्त वेदो का अध्ययन कर लिया – वैसा जानना चाहिये  ।

समाधान —

श्रील रूप गोस्वामिपाद के कृष्णनामाष्टकम् के कतिपय वचन यथा — ‘निखिलश्रुतिमौलिरत्नमाला…’ व भागवतोक्त ‘….यज्जिह्वाग्रे वर्त्तते नाम तुभ्यम्…’ आदि वचनों का लक्ष्यार्थ ‘शुद्धनाम’ (नामाभास व नामापराध नही) से है जो कि केवल उन्नता जातरति (भावभक्ति) व प्रेमाभक्ति की अवस्था प्राप्त होने पर ही साधक की जिह्वा पर स्वतः उदित होतें है। परन्तु वैसी जातरति साधनभक्ति की परवर्तीनी अवस्था है व साधनभक्ति का प्रारम्भ ही सम्भव नहीं बिना शास्त्रोक्त अनुबंधचतुष्टय का ज्ञान प्राप्त किये (यह नियम केवल साधन-सिद्धो के पक्ष में लागु है, नित्यसिद्धो व कृपासिद्धो के सन्दर्भ में नही) — गौडीय सिद्धान्त में! प्रमाण — ‘श्रुतिस्मृतिपुराणादिपञ्चरात्रविधिम् विना । एकान्तिकी हरेर्भक्तिः उत्पातायैव कल्पते ।।’ — ब्रह्मायामलतंत्र का वचन भक्तिरसामृतसिन्धूद्धृत।’ यह अलग बात है कि नित्यसिद्ध व कृपासिद्ध भी शास्त्रीय मर्यादा का ही अनुगमन करते है प्रायः।”

 

— भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर आचार्य श्री रा.कृ.दा.स्वा. ‘आ.वा.’ गुरुपाद भ.र.वे.प्र.के

 

 

 

 

 

An important message —

 

“To assimilate the factual purport of the scriptures is the most sublime form of devotion. Its never the futile sparing of time. Evidence — Srimad-bhagavad-gita 18.67-71.

Prima Facie view –

ṛg-vedo ‘tha yajur-vedaḥ sāma-vedo ‘py atharvaṇaḥ /

adhītās tena yenoktaḿ harir ity akṣara-dvayam //

Rendition –

A person who chants the two syllables ha-ri has already studied the four Vedas — Sāma, Ṛg, Yajur and Atharva.

Conclusion –

The factual import of the assertions of Śrīla Rūpa Gosvāmipāda’s Śrī-kṛṣṇa-nāmāṣṭakam like – ‘nikhila-śruti-mauli-ratna-mālā..’ and those of Śrīmad-bhāgavatam like ‘..yajjihvāgre varttate nāma tubhyaṁ…’ etc. is towards ‘śuddha-nāma’ (not nāmābhāsa and nāmāparādha) – which voluntarily and automatically arises on the tongue of a sādhaka only when he/she reaches the ultimate platforms of bhāva-bhakti (jāta-rati) and prema-bhakti. But, such a stage of jāta-rati succeeds the phase of sādhana-bhakti, and the commencement of sādhana-bhakti cannot be had without the obtainment of the compulsory pre-requisite (in the context of sādhana-siddhas only; not in the case of kṛpā-siddhas and nitya-siddhas) of the scriptural anubandha-caṭuṣtaya-jñānam — in Caitanyaite theology. Evidence — ‘śruti-smṛti-purāṇādi-pañcarātra-vidhiṁ vinā / aikāntikī harer bhaktiḥ utpātāyaiva kalpate //’. It’s another case that, on most occasions, even the nitya-siddhas and kṛpā-siddhas abide by the same scriptural methods.”

— Bhaktirasavedāntapīṭhādhīśvara Ācārya Śrī RKDS ‘ĀV’ Gurupāda of BRVF

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