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‘श्रुतिस्मृतिविरोधाच्च श्रुतिरेव गरीयसी’ – इस शास्त्रवाक्य का तात्पर्य्यार्थ सात्विक पुराणों पर लागु नही पडता क्योकि यहाँ पर अपौरुषेय व पञ्चमवेदस्वरूप सात्विक पुराणों का ग्रहण न होकर वाल्मीकि व व्यास (कि जिन्होंने पुराणों, वेदों एवं रामायण को जो की भगवदनिःश्वसित थे – केवल लिपिबद्ध किया है) के अतिरिक्त अन्यान्य ऋषिमुनियों के द्वारा प्रणीत पौरुषेय आर्षग्रन्थो का ग्रहण है यथा याज्ञवल्क्य आदियों के द्वारा रचित (भगवद्निःश्वसित नही) स्मृतियाँ । विशेषतया श्रीमद्भागवत तो – “…यत्रैषा सात्त्वती श्रुतिः” — इस श्रीमद्भागवतीय वचन के आधार पर परम श्रुति सिद्ध होता है । अन्यथा ऐसा न मानने पर पञ्चमवेदस्वरूप महाभारत का निम्नोद्धृत वाक्य निरर्थक सिद्ध होता है – “बिभेत्यलपश्रुताद्वेदो मामयं प्रहरिष्यति” – क्योकि यदि चार वेदों एवं तदङ्गभूता श्रुतियों कि व्याख्या पञ्चमवेदात्मक पुराण व इतिहास के आधार पर विधेय है तब तो पूर्वापर में (अर्थात श्रुतियों एवं पञ्चमवेद के मध्य) विरोध होना संभव ही नही जैसे कि व्याख्येय एवं व्याख्या के बीच नही होता । यदि व्याख्येय एवं व्याख्या के बीच विरोध हो तब तो उस व्याख्या को व्याख्या रहने का ही अधिकार नही । जबकी श्रीमद्भागवत को श्रुतियों, स्मृतियों, इतिहास, ब्रह्मसूत्र एवं गायत्री का भाष्य माना गया है व्यासमुनि के द्वारा पञ्चमवेदात्मक गरूडपुराण में । अतः जब व्याख्या के आधार पर व्याख्येय को समझना है तब तो दोनो के बीच में विरोध स्वीकारा ही नही जा सकता और यदि कोई यह मिथ्या तर्क करे कि व्याख्येय के अनुसार व्याख्या को समझा जाए तब तो व्याख्या एवं व्याख्येय का सम्बन्ध ही विपर्यय को प्राप्त होकर व्याख्येय को व्याख्या मानना एवं व्याख्या को व्याख्येय मानना पडेगा क्योंकि जिसके अनुसार जिसको समझा जाये वही समझानेवाली व्याख्या मानी जायेगी और जो समझाया गया हो वही व्याख्येय माना जायेगा । पर इस प्रकार के विपर्यय के होनेपर श्रीमद्भागवत व्याख्या न रहकर व्याख्येय बन जायेगा एवं गरूडपुराणोक्ति निरर्थक सिद्ध होगी । पञ्चमवेदात्मक सात्विक पुराणों की वाणी को मिथ्या मानना भी पाप है । चूँकि व्याख्यास्वरूप श्रीमद्भागवत के आधार पर ही व्याख्येयस्वरूप प्रस्थानत्रयात्मक ब्रह्मसूत्र, उपनिषद् (श्रुति) एवं भगवद्गीता की व्याख्या शास्त्रविधेया है, अतः इस स्थिति में परमप्रमाणस्वरूप श्रीमद्भागवतरूपी व्याख्या को ही माना जायेगा प्रस्थानत्रय के वास्तविक तात्पर्यनिर्णायक होने के कारण । परमस्वतःप्रमाणस्वरूप शास्त्र ही अन्यों का तात्पर्यनिर्णायक हो सकता है (गरुडपुराणोक्ति – ‘भारतार्थविनिर्णयः’ पर ध्यान दे) एवं उसी के आगे अन्य शास्त्रों की गरिमा निष्प्रभा हो जाती है यथा – “वेदवेदान्तघोषैश्च गीतापाठैर्मुहुर्मुहुः” (पद्मपुराणोक्त वचन) एवं केवल उसी के आविर्भावन से भगवदवतारस्वरूप कृष्णद्वैपायन व्यासमुनि को भी आत्यन्तिक परितोष का लाभ होता है ।

 

निष्कर्षरूपेण श्रीमद्भागवत का अपौरुषेयत्व, परमस्वतःप्रामाण्य, प्रस्थानत्रय का भागवतानुगतव्याख्येयत्व एवं श्रीभागवत का सर्वशास्त्रतात्पर्यनिर्णायकत्व होने के कारण उस श्रीभागवत का सर्वप्रमाणचक्रवर्त्तित्व सिद्ध हुआ तथा गौडीयवैष्णवाचार्यप्रवर चैतन्यदेवचरणानुचारिश्रीरूपसनातनानुग विश्ववैष्णवराजसभासभाजनवर्य्य जगद्विजयिनी प्रतिभावन्त श्रीजीवगोस्वामिपाद के ही तत्वसन्दर्भोद्धृत विचारों का सर्वोत्कर्षत्व सिद्ध हुआ । व्यतिरेक से ब्रह्मलीन धर्मसम्राट् अद्वैतधुरन्धर शाङ्करमतावलम्बी स्वामी हरिहरानन्द करपात्री जी की मान्यताओं का निरसन भी हुआ ।

 

गौडीयवैष्णवसम्प्रदायो विजयते! सनातनधर्मान्तर्गतवैदिकपाञ्चरात्रिकभागवताम्नायो विजयते!

 

— भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर आचार्य श्री रा.कृ.दा.स्वा. ‘आ.वा.’ गुरुपाद

(भ.र.वे.प्र. — आणन्द, गुजरात, भारत)

 

 

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