Śrila Jīva Gosvāmīpāda - The illsutrious apostle of Lord Śrī Caitanya Mahāprabhu

 

कुछ कलिहतमतियुक्त मूर्ख ऐसा प्रलाप करते हैं कि सात्त्विकादि पुराणों का राजसिक, प्रकीर्ण एवं तामसिक श्रेणीबद्ध पुराणों से विरोध उपस्थित होने के कारण भले ही सात्त्विकादि पञ्चपुराणों एवं त्रैगुण्यरहित श्रीमद्भागवत के वचनों को वरीयता दी जाए पर इससे तो पुराणों का स्वतःप्रामाण्य खण्डित हो जाता है भले ही उन्हें पञ्चमवेद  की आख्या से अलङ्कृत किया गया हो । स्वतःप्रामाण्य इसलिये खण्डित हो जाता है क्योकि जब एक श्रेणीभुक्त पुराणों के वचनो का बाध अन्य श्रेणीगत पुराणों से हो जाता है तो स्वतःप्रामाण्य की शास्त्रीया परिभाषा जो कि ‘इतरप्रमाणानपेक्षत्वम्’ है वह लागु ही नही पडती । अतएव पुराणों का पञ्चमवेदत्व सिद्ध होने पर भी उनका स्वतः-प्रामाण्य सिद्ध नही । एवं इसी कारण से केवल प्रथम चार वेदों का ही स्वतःप्रामाण्य स्वीकृत है । — इस प्रकार का अनुचित पूर्वपक्ष प्राप्त होने पर इसका समाधान यों है – यदि एक शास्त्र के वचन का अन्य शास्त्र के वचन से बाध होना ही स्वतःप्रामाण्य की असिद्धि मानी जाए तब तो वेदत्रयी के भी त्रिगुणप्रधाना होने के कारण यदि उसका (वेदत्रयी का) भी बाध पञ्चमवेदात्मक इतिहासस्वरूप महाभारतान्तर्गता श्रीमद्भगवद्गीता के २.४२-४५ वाले वचनों के द्वारा होता हुआ पाया जाए  (‘त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन’ – यहाँ भगवान् वेदों को त्रिगुणपरक बताकर अर्जुन को निस्त्रैगुण्य अर्थात वेदत्रयी को त्यागने की प्रेरणा दे रहे हैं कि जो बुद्धदेव के द्वारा प्रतिपादित ‘वेदाः नास्ति प्रमाणम्’ के समान नही हैं क्योकि यहाँ श्रीकृष्ण वेदों को अप्रामाणिक नही बता रहें, प्रत्युत उन वेदों को प्रामाणिक एवं स्वतःप्रमाण मानते हुए भी उन्हें त्यागने का आदेश दे रहे हैं – जो की एक अपूर्व बात है ।), तब तो बाध्य होकर वेदों के भी स्वतःप्रामाण्य की असिद्धि स्वीकारनी होगी – जो कि सर्वथा अनुचित है । अतएव यह प्रतिपन्न होता है कि एक शास्त्र के वचनों का बाध अन्य शास्त्र के वचनों के द्वारा होने पर भी उस पूर्ववर्त्ती शास्त्र (जो कि बाधित है) का तथा परवर्ती शास्त्र (जो की बाधक है) का – उभय का ही स्वतःप्रामाण्य खण्डित नही होता है यदि वें पूर्ववर्त्ती तथा परवर्त्ती शास्त्र  भगवद्निःश्वसित एवं अपौरुषेय के रूप में निर्णीत किये गये हो माध्यन्दिनि एवं बृहदारण्यक आदि श्रुतियों के स्पष्ट साक्ष्यों पर (श्रुतियों में चार वेदो के साथ इतिहास एवं पुराणों को पञ्चम वेद एवं भगवद्निःश्वसित होने के कारण अपौरुषेय माना गया है एवं इसी आधार पर तत्त्वसन्दर्भ में पुराण-इतिहास को चतुर्वेदों का सजातीय माना गया है) ।

 

 

यदि यहाँ पर ऐसा तर्क किया जाए कि गीता के स्मृतिप्रस्थान में परिगणित होने के कारण गीता में किये गये वेदत्रयी के बाध को निरस्त माना जाये (स्मृति से श्रुति के प्रबल होने के कारण) तब तो गीताशास्त्र की उपादेयता ही समाप्त हो जायेगी एवं वह मोक्षशास्त्र निरर्थक हो जायेगा! अतएव गीता को उन स्मृतियों में नही परिगणित किया गया जो कि श्रुति (वेदत्रयी) के द्वारा बाध को प्राप्त हो  । अतएव ‘इतरप्रमाणानपेक्षत्वम्’ (अर्थात् ‘स्वतःप्रामाण्य का तात्पर्य है कि वह अन्य प्रमाणो के द्वारा बाधित वा समर्थित नही हो सकता’) में ‘इतर’ अथवा ‘अन्य’ शब्द चार वेद, उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र, गीता, महाभारत, वाल्मीकीय रामायण, पञ्चरात्र एवं पुराणों का द्योतक नही क्योंकि वे सभी भगवद्निःश्वसित एवं अपौरुषेय होने के कारण सजातीय है – विजातीय न होने के कारण ‘इतर’ वा ‘अन्य’ की श्रेणी में परिगणित ही नही । इसी कारण से अपौरुषेय एवं भगवद्निःश्वसित उपरोक्त शास्त्रो के अतिरिक्त  अन्य जो भी आर्षग्रन्थ ऋषिमुन्याचार्य-प्रणीत है, वे सभी ही इतर-प्रमाण की श्रेणी में आते है एवं उनकी ( उन आर्षग्रन्थों की) अपेक्षा आप्तवाक्यस्वरूप अपौषेय भगवद्निःश्वसित ग्रन्थों को नही रहती ।

 

 

यह अलग बात है कि उन आर्षग्रन्थों में से बहुतेरे ऐसे भी हैं जो की मूल अपौरुषेय ग्रन्थों से पूर्ण वैचारिक मेल में हो । यदि ऐसा आनुगत्यमय मेल हो तो उन आर्षग्रन्थों को अपौरुषेयशास्त्रानुकूल होने के कारण उनकी भी शास्त्रीयता स्कन्द-पुराण के माध्व-भाष्योद्धृत वचनों से हो जाती है । ऐसी स्थिति में वे आर्षग्रन्थ शास्त्र तो माने जाएँगे पर अपौरुषेय एवं स्वतः-प्रमाण नही  ।

 

 

वेदव्यास एवं वाल्मीकि रामायण एवं पुराणेतिहासो कों केवल आविर्भूत कराते हैं – उनके रचनाकार नही हैं वें – इस बात को पुराणों में स्पष्ट किया गया है । अतएव पुराणों की भगवद्निःश्वसितता एवं अपौरुषेयता सिद्ध हुई उनमे तारतम्यमूलकप्रामाण्यबल के साथ  । महाभारत के आदिपर्व के प्रथमाध्याय में वेदव्यास के द्वार जो श्लोकों के रचन की बात देखी जाती है वह केवल उस नित्य इतिहासरूपा पञ्चमवेदस्वरूपा यजुर्वेदोच्छिष्टा वाणी का उनके द्वारा अविर्भावनमात्र है एवं विनायकदेव  उसको लिपिबद्ध करने वाले है – ऐसा समझना है ।

 

 

गौडीयवैष्णवसम्प्रदायो विजयते! सनातनधर्मान्तर्गतवैदिकपाञ्चरात्रिकभागवताम्नायो विजयते!”

 

— भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर आचार्य श्री रा.कृ.दा.स्वा. ‘आ.वा.’ गुरुपाद
(भ.र.वे.प्र. — आणन्द, गुजरात, भारत)

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