आज का सन्देश –

 

“भक्तिरसामृतसिन्धु एवं रागवर्त्मचन्द्रिका आदि प्राचीन गौडीय वैष्णव ग्रन्थों के अनुसार प्राप्त भगवत्प्रेम को रसावस्था में परिवर्त्तित करने के लिये एक अतिरिक्त जन्मान्तर की अपेक्षा बनी रहती है तथा अप्रकट-व्रज-लीला में प्रविष्ट होने से पूर्व प्रकट-व्रज-लीला में प्रवेश पाना पडता है एक अन्य जन्मान्तर में । कुल मिलाकर साधक को तीन न्यूनतम जन्मों की अपेक्षा रहती है अन्तिम लक्ष्य से पहुँचने से पूर्व – चाहे भले ही वह द्रुतगति से निपुण साधना ही क्यों न करे । यदि कोई तथाकथित आधुनिक (पारम्परिक नही) चैतन्यानुयायी यह सिद्धान्तित करता है कि अप्रकट-व्रज-लीला में प्रवेश एक ही जन्म में प्राप्त होता है तो इससे बडा और कोई दूसरा मिथ्या जल्प नही हो सकता ।”

 

  • भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर आचार्य श्री गुरुपाद

 

Today’s message —

 

“According to Gauḍīya Vaiṣṇava classical treatises like Bhaktirasāmṛtasindhu and Rāgavartmacandrikā etc. one more birth is required to convert bhagavat-prema into rasa and then still, one more birth in the prakaṭa-vraja-līlā before entering the final destination of aprakaṭa-vraja-līlā. In total, minimum three lives are taken even if speediest and sincerest sadhana is done. If some so-called neo-Caitanyaite (not conventional) is claiming that the final destination of aprakaṭa-vraja-līlā can be obtained only in one lifetime, its the biggest hoax possible.”

 

  • Bhaktirasavedāntapīṭhādhīśvara Ācārya Śrī Gurupāda

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